अभी अभी बचपन को देखा
हँसते और खिलखिलाते देखा
शाम तो कब की ढल चुकी मगर
उसको फिर से जगमगाते देखा!
वाकई में अदभुत था वो नज़ारा
खुशियों का छोटा सा पिटारा
ना ही रूप रंग का भेद वहां
ना ही लड़के लड़की का फर्क वहां
सुन्दर, पवित्र, चिंता मुक्त
ऐसा फिर से बचपन देखा!