एक छोटी सी कहानी...
मिट्टी की परतों से बनी हूँ मैं
फिर भी है सबको मुझपे कितना भरोसा
सपने दिए मुझे कितने सारे
लगाया अपने दिल से कई बार
मुझको सर आँखों पे चढ़ाया
हालाँकि सपने बदलते रहे हर दिन...
लेकिन खुश थी मैं, सपने सँजोने में उनके
फक्र हुआ हर खुद पे हर बार
जब जब उन्होंने मुझे अपने हाथों में जोर से थामा
उन्हें डर था,
की कहीं मैं बिखर न जाऊं
सपने सारे कहीं टूट न जाएँ
लेकिन उनके भरोसे को टूटने देना न था
न ही टूटने दिया मैंने...
खुश थी मैं, सपने सँजोने में उनके
आज एक धमक से भले ही मुझे टुकड़े टुकड़े कर दिया
लकिन उस एक मुस्कान से मेरा अस्तित्व सफल कर दिया..
यही हूँ मैं,
सपनो से भरी,
मिट्टी की परतों से बनी..
यही है मेरी छोटी सी कहानी..एक गुल्लक की कहानी !!
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